Monday, July 12, 2010

आँखें

नील गगन सी नीली आँखें
आँखों पर हैं कितनी आँखें

यूँ तो मटके में पानी था
प्यासी मर गई बूढी आँखें

कोर चिड़ी ने भी ना खाया
आँखों में थी नन्ही आँखें

डिग्री की सीढ़ी थी फिर भी
ठेठ कूए में डूबी आँखें

मंदिर मस्जिद माँ की छाती
क्या जानेगी अंधी आँखें

Sunday, July 11, 2010

कई दिनों के बाद.......

कई दिनों तक चूल्हा रोया ,चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोयी उसके पास


कई दिनों तक लगी भीत पर चिपकिलियों की गस्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त


दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद


धुआ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद.......

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद.......

कौव्ये ने भी खुजलाई पांखे कई दिनों के बाद.....

Thursday, July 8, 2010

बालविधवा

दर्द के साये में भी जवां हो गयी ख्वाहिशें,
तमाम बन्दिशें फिर भी मिटती नहीं तमन्नायें,
बालविधवा हूँ मैं, कितना समझाया मन को,
फिर् भी बाँवरा मन करे नित नयी कामनायें

बचपन से देखा तन पर श्वेत वस्त्र ही,
क्या करुँ जो मन रंगों को देख अकुलाता है,
सुनकर खनक चूड़ियों की किसी कलाई में,
मन फिर मन है, कभी मचल ही जाता है.

ना देश के लिये ना अपने लिये,
मिटा रहा मेरा जीवन समाज किसके लिये.
जिसे ना जाना ना समझा कभी मैने,
सारी उम्र आँसू कैसे बहाऊँ उसके लिये.

ईश्वर का वरदान है ये मानव जीवन,
ना जलाओ चिताओं के साथ अबलाओं को...
बदला है वक्त, बदलो ये समाज भी,
अब चिता नहीं, डोली दो इन विधवाओं को.............

This is not my poem this poem is belong to Sonal ji

एक जीवनी

सागर की गहराईयों से गहरा
आसमां की ऊंचाईयों से ऊंचा
नदियों की लंबाई से लंबा
दरिया के बहाव से तेज
पहाडो के ठहराव से ठहरा
पठार के समता से समतल
विचारों की उलझनों से घना
प्रभु की प्रतिमा से पवित्र
प्रेम भरे शब्दों से मीठा
नफरत रूपी विष से कडवा
पहली बार पंख़ पसारती तितली से मासूम
गर्म तपती आग से कठोर
मां की ममता से सलोना
पिता के आशिर्वादों से मजबूत सहारा
बिन बोले बालाक क़ी बातों से आनोखा
कुछ ऐसा ह् होता है...
खुद से खुद का रिश्ता
ये रिश्ता जिसकि बुनियाद
पल में गहरी और पल में खोखली है
बस्.. फर्क दिखता है कर्म में
ये रिश्ता...
जो आत्मविश्वास मे पनपता है
ये रिश्ता
जो ऊपर से बनकर आता है
जमीं पर रंग बदलता है
और फिर...
उसी दुनिया मे संग आत्मा के
चला जाता है
बस...आने जाने के इस फेरे में
एक जीवनी लिख जाता है.

Wednesday, July 7, 2010

एक बार जो तुम आ जाते..

विरह का वेदना से सम्बन्ध दिल
आज समझ पाया है
क्या
लिखा था आँखों में तुम्हारी
मन
आज ये पढ़ पाया है
दिल ही दिल मे
की भक्ति को
हम भी अपना नमन दे पाते,
एक बार जो तुम आ जाते..
जुदाई ने आकर समझाया
ये रिश्ता
जो दिल ने दिल से बाँध लिया था
अब तुम्हारे लिये तरसता ये दिल

तब क्यूं ना तुमने इज़हार किया था

मन के आँगन में प्रेत से भटकते
ख्वाब
सारे मोक्ष पा जाते,
एक बार जो तुम आ जाते..

Not Mine This poem is belong to sonal srivastava

Tuesday, July 6, 2010

ना चोट अपनी ना दर्द अपना

ना जमीं अपनी ना आसमान अपना
हम फ्लैटों में रहते हैं

रिश्तों के वर्क से मिट गयी हर इबारत
ना माँ अपनी ना बाप अपना
हम फ्लैटों में रहते हैं

जिंदगी की दौड़ में खो गयी है कहीं
ना हँसी अपनी ना अरमां अपना
हम फ्लैटों में रहते हैं

इन्टरनेट पर करते हैं सारी दुनिया से चेटिंग
ना सखी अपनी ना सखा अपना
हम फ्लैटों में रहते हैं

बाजू वाले का नाम 217 न. वाले शर्मा जी
ना गली अपनी ना गाँव अपना
हम फ्लैटों में रहते हैं

रहते हैं घरों में चिड़ियाघरों से
ना शाम अपनी ना सहर अपना
हम फ्लैटों में रहते हैं

जीने की कशमकश में मर गए एहसास
ना चोट अपनी ना दर्द अपना
हम फ्लैटों में रहते हैं

Thursday, July 1, 2010

पापा की याद में

दस बरस हो चुके हैं फिर भी
आज भी आप ज़िंदा हो।
आज भी ऐसा लगता है कि
करते आप मेरी चिंता हो।

पितृ ऋण एक ऐसा ऋण
शय्या पर पूरा कहा जाता।
मैं कहता हूं, ये ऐसा ऋण,
संस्‍कार बिन पूर्ण न हो पाता।

कोसों पैदल चलकर भी
आपने महंगी फ़ीस भरी।
हम बेटे कुछ लायक बनें,
इस पर ज़िंदगी नाम करी।

याद आ जाता है बरबस
आज भी आपका दौड़े आना,
जब भी मैं खड्ढों में अटका
अपने काम को छोड़े आना।

मेरी हर बेबसी को बरबस,
आंखों ही आंखों में समझ जाना।
कैसे भूलूं आपको पापा,
क्‍यों मुश्किल फिर आपको पाना?

सब कुछ पा सकता हूं शायद,
पर नहीं मिल सकती वो सुरक्षा।
जो आप सिखा गए हो मुझे
नहीं मिल सकती अब वो शिक्षा।

भूले नहीं भूले हैं वो दिन
एक्‍ज़ाम के वो दुश्वारी भरे दिन
जब पढ़ते पढ़ते मैं सो जाता
और आपको अचानक कोने पाता
उठाते मुझे कि बेटा उठ जा
कल के दिन तक मेहनत कर आ
फिर उठकर मैं जो पढ़ता
तो अगले दिन बस
अच्‍छा ही करता।

मृत्‍यु शैया पर आपका होना
लगा मुझे छिन गया बिछौना
मालूम न था कि हंसू या रोऊं,
दिख रहा था पूरे परिवार का रोना।

दस बरसों में छिन गया बचपन,
आपको पाया विचारों में हरदम,
हर वक्त ग़लत करने से रोका,
कुछ करने से पहले आपको सोचा,
आपकी साख कहीं मलिन तो न होगी,
हर वक्त यही एक विचार रहता।

फ़ादर्स डे आएं और जाएं
सब पिता का स्‍नेह पाएं।
पर हम से पितृविहीन
अपने पिता को बस
विचारो में पाएं।

फ़ादर्स डे मेरा हर एक दिन है।
संघर्षमयी ही बस जीवन है।
सुरक्षा की अब आस करूं क्‍या
शान्‍ति से समझो, बस अनबन है।