Tuesday, July 27, 2010

ये दुनिया खूबसूरत है

ख़ानदानी रिश्तों में अक़्सर रक़ाबत है बहुत
घर से निकलो तो ये दुनिया खूबसूरत है बहुत

अपने कालेज में बहुत मग़रूर जो मशहूर है
दिल मिरा कहता है उस लड़की में चाहता है बहुत

उनके चेहरे चाँद-तारों की तरह रोशन हुए
जिन ग़रीबों के यहाँ हुस्न-ए-क़िफ़ायत1 है बहुत

हमसे हो नहीं सकती दुनिया की दुनियादारियाँ
इश्क़ की दीवार के साये में राहत है बहुत

धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे
गुर्वतों का दौर है जाड़ों की शिद्दत2 है बहुत

उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मी
रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत

Monday, July 26, 2010

माँ तुम्हारा खत

माँ
अब तुम्हारा खत
मुझे वो उष्मा नहीं देता
जब पहले पहल तुम्हारे आँचल से दूर
अनजानी हवाओं में तनहा हुआ था
पहले पहल जब मेरे पैरों के पास
ज़मीन हुई थी
और मेरे पंख कुतर गये थे
माँ तभी पहले पहल
जब तुम्हारा खत मिला था
तो उसे पढ पाना मुश्किल हो गया था
मेरे बेसब्र अनपढ आँसुओ के उतावलेपन में
और माँ
उस दिन सितारे फीके नहीं लगे
चाँद से दोस्ती हो गयी
और उस दिन मैं गुनगुनाता ही रहा घंटों

माँ!
जैसे जैसे सूरज मेरी छाती पर चढता जाता है
जैसे जैसे ज़िन्दगी मरुस्थल होती जाती है
मैं अपनें जले पाँव और छिली छाती लिये
किताबें ओढ लेता हूँ
दिमाग का भारीपन भुला ही देता है तुम्हे
मैं काश कि तुम्हारी गोद में सिर रख
आखें बंद करता
और वक्त की सांसें थम जाती
और माँ जब भी एसा सपना आता है न
तब मुझे अपना रूआसापन भला नहीं लगता
मेरे रोनें पर तुम्हे दुख होता होगा है न माँ...

क्या समय बीतता है तो अतीत पर
जम जाती है मोम की परत
तुम्हारे खत अब भी तो आते हैं
वैसे ही खत
वे ही नसीहतें
वे ही चिंतायें
जैसे कि तुम्हारे लिये वक्त ठहरा हुआ हो..

माँ तुम बहुत भोली हो
और भागती हुई दुनियाँ तुमसे बहुत आगे निकल चुकी है
मैं भी बदल गया हूं माँ
बडा हो गया हूं शायद
कि अब तुम्हारे खत
मुझे वो उष्मा नहीं देते
जबकि तुम्हारे खत की खुश्बू वैसी ही है
तुम्हारे खत पढ कर मन मोर नहीं होता लेकिन
बादल हो जाता है माँ
और माँ लगता है
भट्टी में तप कर कुन्दन बन निकलूं
क्योंकि दुनिया की सबसे अच्छी माँ मेरी माँ है..

लेकिन माँ
एसा भी होता है
जब दिनों तक तुम्हारे खत नहीं आते
तो दिनों तक कुछ भी अच्छा नहीं लगता
सितारे उदास हो जाते हैं
चाँद गुमसुम
एसा अब भी होता है लेकिन..

Wednesday, July 14, 2010

इस दिल का ये हाल तो देखो....

इस दिल का ये हाल तो देखो....

अरमानो के ये चाल तो देखो...

कैसे-कैसे मचलते है इनके हाल तो देखो..............

कभी पयमनो के साथ छलकते है....

कभी अरमानो के साथ मचलते है ...

कभी हवाओ के संग उड़ते है ....

कभी बारिश में तन मन भीगोते है ...

कभी मस्त हो अजब सी दुनिया में खोये रहते है.......

ऐसी सतरंगी दुनिया के निराले चाल तो देखो................

कभी सरसों के पीले फूलो से रंग उड़ाते है ....

कभी फलक को छूने की चाह सजाते है .....

कभी तितली के रंग-बिरंगे पंख लगा सपनों में उड़ते है ....

कितनी रुपहली दुनिया है जिसमे ये कैसे -कैसे रूप सजाते है ...........

हमने मुस्कुराना सीखा है

जिंदगी के हर गम को भूल हमने मुस्कुराना सीखा है



गुलो का तसुव्वर देख हमने मुस्कुराना सीखा है



बदलते रुत से हमने ये जिंदगी जीना सीखा है.



जो गम मिले जिंदगी में उसे हमने भुलाना सीखा है



दूर कंही मिलते है ज़मी आसमान उनसे उम्मीद जगाना सीखा है



साहिल और समंदर को देख हमने इठलाना सीखा है



यूँ तो हर कोई खुद को गम में डूबा देता है



दरिया की मौजो से हमने आगे बाद जाना सीखा है



मिट्टी की सोंधी खुशबु से गुलशन को महकाना सीखा है



गमो को भूला हमने खुद को ख़ुशी की बारिश में भिगोना सीखा है.....

Tuesday, July 13, 2010

कल वह वेश्या बन बरबाद हुयी |

कल वह वेश्या बन बरबाद हुयी |

उसे भूख थी धन की ,
उन्हें प्यास थी तन की,
किसी के रात्रि का श्रृंगार बनी,
या फ़िर विवशता का शिकार बनी ,
जब उसका जीवन डूबा अंधियारे मे,
तो उनकी रातें चार चाँद हुयी ,
कल वह वेश्या बन बरबाद हुयी |

अन्तिम निर्णय ले डाला,
जीवन सारा खो डाला ,
उसके अस्तित्व का हनन हुया,
देख उसे कोई मगन हुया ,
हर दर कितनी आस लगाई ,
पर सफल ना फरियाद हुयी ,
कल वह वेश्या बन बरबाद हुयी |


दुनिया मुर्दों की भीड़ लगती है,
अब अपने पर चीढ़ लगती है,
यह तो एक छिपा बाज़ार है,
रोज बिकते उस जैसे हज़ार है,
बनी वेश्या चेतना हमारी पहले,
वह तो इन सबके बाद हुयी,
कल वह वेश्या बन बरबाद हुयी |

जब कभी

जब कभी महसूस करो अकेलापनअपनी तन्हाई से घबरा जाओ,
भर आयें आँखें यूँ ही अचानक और कारण तुम समझ न पाओ....
तो बेचैन हूँ मै भी तुम्हारी याद मेंये अनुमान सहज लगा लेना ,
पलके बंद कर याद करना मुझेख़्वाबों में अपने पास बुला लेना...
जाति की कोई बंदिश होगीना रिवाजों के वंहा पहरे होंगे,
ख़्वाबों की दुनिया में हम तुमसबसे दूर अकेले होंगे ..
कर लेना फिर बातें मुझसे चाहे जितनीफिर
अपनी
निगाहों से छू जाना मुझेप्यार एक दिन रंग लायेगा
अपनाहौसला फिर थोडा दे जाना मुझे

Monday, July 12, 2010

नीली पलकें

नीली पलकें मरू में जल सी
मन प्यासा प्यासा रहता है .


नीली पलकें नीलाम्बर में
उड़ते हंस की पाँखों सी
झुक जाए तो कँवल पटल पर
तितली का जोड़ा लगता है


नीली पलकें चपल चन्द्र दो
छाँव सरोवर में हिलती है
नीरवता में रुनझुन रुनझुन
अमरित का झरना झरता है