
कश्तियाँ प्यार की रेत पर नही चलती.....
कश्तियाँ प्यार की
रेत पर नही चलती
यकीं नही है तो
कह कियू नही देती
आखिर तुम्हे किसने रोका है ..?
प्रणय के उपवन में हारें कैसे लाएगी
बसंत जब तक न होगा
शक और सवालों का अंत
जब गुलो के शजर ही न होंगे
गर जड़े ही न होंगी
यकीन की जमीं में वो दरख्त..
कैसे फूलेंगे फलेंगे
जिन्दगी दो तरह से जीते है
लोग इक जिनकी ऊँगली
पकड कर जिन्दगी उन्हें चलना सिखाती है
दुसरे वो ..
जो जिन्दगी को चलना सिखाते है
बांह मरोड़ कर उसकी चाहें जंहा ले जातें है ..
कई जिद के आगे हार जाते है
तो कुछ जिद पर जब अड़ जातें है
तो तकदीर तस्वीर और ताबीर बदल देते है .
उनको इतना यकीन . होता है
खुद के फैसलों और अपनी जिद पर
और वो खोखले नही होते
वो जमाने के लिए कुछ भी हो
खुद के लिए दोगले नही होते
या तो रुक जाओ ..
डरते डरते सफर मत करो
चल पड़े हो तो कभी मत रुको
मृत्यु के बाद भी ..
या तो रुक जाओ ...
या फिर अविरल बह जाओ ..
मै इन्तजार करूंगा तुम्हारा . .
जबाब दो तो भी
वर्ना तुम्हारे मौन मै ही पढ़ लूँगा
तुम्हारे मन की बात ..
हो गर तुम्हे खुद पर विश्वास
तो ही करना तुम मुझ पर विश्वाश
प्यार बाद में...
करना पहले भरोसा तो करना सीखो

