Friday, April 1, 2011

मैं फिर से हार जाता हूँ!!!!!


कभी रिश्ता कहीं छूटे, कभी वादा कोई टूटे

कभी मैं रूठ जाऊँ या कभी मुझसे कोई रूठे

कभी तकरार की खातिर,

कभी या प्यार की खातिर

वही आँसू भरा नगमा मैं फिर से गुनगुनाता हूँ

वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ

तुम्हारी आँख का आँसू मेरी पलको पे छा जाये

तुम्हारा दर्द सीने का, मेरी किस्मत में आ जाये

तेरे जीवन का हर नश्तर

तुम्हारी राह का पत्थर

मेरे फटते हुए दामन में मैं भरता ही जाता हूँ

वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ

दिल की जो है ख्वाहिश कभी पूरी ना कर पाऊँ

कभी किस्मत नचाये और मैं नचता चला जाऊँ

कभी जीवन बने उलझन

कभी जीना बने बंधन

जिसे दिल में दबाये होठों से मैं मुस्कुराता हूँ

वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ

कभी वो पास होता है तो फिर अहसास होता है

कि चाहे कुछ भी हो जाये मनुज तो दास होता है

मेरा अधिकार झूठा है

और ये संसार झूठा है

कोई सच मिल ही जायेगा, यही सपना सजाता हूँ

वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ

नाम

नहीं, नहीं
इसे नाम ना दो.
इतनी भावनायें, इतना प्यार
इतनी विविधता
'एक' नाम में कैसे आ सकेगा?
नाम दे कर तुम अधूरा बना दोगी इसे.
क्युंकि नाम देना, बांधना है.

किसी ने मुझे नाम दे दिया.
अब मैं सिर्फ़ 'सिद्धार्थ ' ही हूँ
चाहूँ,
तो भी वैभव, आशीष या राधिका नहीं हो सकता.
नाम देने वाले ने
कुछ और होने का हक मुझसे छीन लिया.
अब मैं कोशिश भी करूँ,
तो भी -
कोई मुझे कुछ और नहीं होने देगा.

मैं,
मेरे और तुम्हारे रिश्ते को
खुद की तरह मजबूर नहीं देखना चाहता.
सो, उसे नाम ना देना.

नाम के बंधन से स्वतंत्र होगा -
तो उसमें संभावनायें होगीं
अपेक्षाएँ नहीं.
वो जब चाहे, जो चाहे बन सकेगा.

और हर परिस्थिति में टिके रहने के लिये,
बदलाव की ताकत जरूरी है.
सो इस रिश्ते को नाम ना देना,
नाम - मजबूरी है.

Sunday, March 27, 2011

जरुरत नहीं रही !!

खंडहर बचे हुए है, इमारत नहीं रही !
अच्छा हुआ की सर पर कोई छत नहीं रही!!

कैसी मशाले लेकर चले तीरगी में आप !

जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही !!

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया !
हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही!!

मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा !
या यूँ कहो की बर्क(बिजली) की दहशत नहीं रही !!

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते है लोग !
रो रो कर बात कहने की आदत नहीं रही !!

सीने में जिन्दगी के अलामत(चिन्ह्ह) है अभी !
गो जिन्दगी की कोई जरुरत नहीं रही !!


Monday, March 7, 2011

मै तुम्हारे प्रेम की भाषा समझता हूँ

है तुम्हारे मन मे जो आशा, समझता हूँ

मै तुम्हारे प्रेम की भाषा समझता हूँ


चाहती हो तुम, चलें नदिया किनारे हम

हाथ रखकर हाथ मे बातें करें मन की

चाहती हो तुम कि बैठें वृक्षछाँवों में

हम गढें नूतन कहानी दिल के सावन की


मै मिलन की घोर अभिलाषा समझता हूँ

मै तुम्हारे प्रेम की भाषा समझता हूँ



तुम बिताना चाहती हर पल, मिरे अन्दर

क्योकि मुझको अपने अन्दर रख चुकी हो तुम

पाके मुझसे बून्द भर की एक आशा में

दिल मे इक गहरा समन्दर रख चुकी हो तुम


क्यो है इक निस्वार्थ मन प्यासा, समझता हूँ

मै तुम्हारे प्रेम की भाषा समझता हूँ



चाहती हो तुम कि हम दोनो की नज़रों में

सिर्फ हम दोनों की सूरत ही नज़र आये

चाहती हो तुम कि जब दर्पण तुम्हे देखे

हर अदा मेरे लिये सिंगार कर आये


प्यार की गहरी है जिज्ञासा, समझता हूँ

मै तुम्हारे प्रेम की भाषा समझता हूँ



है तुम्हारा मन भी मिलने के लिये ब्याकुल

हाँ, मगर लज़्ज़ा के कारण कह नही पाती

तुम मुझे ही देखने छ्त पर टहलती हो

बिन मुझे देखे तुम्हें भी नींद कब आती


कौन है कितना यहाँ प्यासा, समझता हूँ

मै तुम्हारे प्रेम की भाषा समझता हूँ

Sunday, March 6, 2011

एक नए शहर में मर जाने का ख्याल बहुत अजीब लगता है !


एक नए शहर मेंजिसे अभी आपकी जान पहचान भी ठीक से ना हुयी हो मर जाने का ख्याल बहुत अजीब लगता है शायद ए ,बी रोड पर किसी गाडी के नीचे आकर फिर अपने कमरे में ही करेंट से
ऐसा भी हो सकता है की बीमारी से लड़ता हुआ
चल बसे कोइ
हो सकता है संयोग ऐसा हो अगले कुछ दिन
तक कोई संपर्क भी ना करे
माँ के मोबाइल में बैलेंस ना हो और वो करती रहेफ़ोन का इन्तजार दूर देश में बैठी आपकी प्रेमिका /पत्नी मसरूफ हो किसी जरुरी
काम में
या फिर वो फ़ोन करे और उसका जवाबही ना मिले दफ्तर में अचानक लोगो को ख्याल आएगा की उनके बीच एक आदमी कम है ऐसा भी हो सकता है की लोग आपको ढूँढना चाहें

लेकिन उनके पास आपका पता ही ना हो........

Saturday, March 5, 2011

हम ना रहते !!


कहा तक जफा हुस्नवालो की सहते !

जवानी जो रहती तो फिर हम ना रहते !!

वफ़ा भी ना होती तो अच्छा था वादा!

घडी दो घडी तो कभी शाद रहते !!

नशेमन ना जलता निशानी तो रहती!

हमारा था क्या ठीक रहते ना रहते !!

बताते है आंसू की अब दिल नहीं है !

जो पानी ना होता तो दरिया ना बहते !!

जमाना बड़े शौक से सुन रहा था !


हमी सो गए दास्ताँ कहते कहते !!

कोई नक्श और कोई दीवार समझा !

जमाना हुआ मुझको चुप रहते रहते !!

मेरी नाव इस गम के दरिया में "सिद्धार्थ"!

किनारे पर आ लगी बहते बहते!!

Tuesday, March 1, 2011

दुवाए अच्छी है !!

मेरे शहर की हवा अच्छी है !
हर मर्ज की दवाए अच्छी है !!

सबके बच्चे लौटते है महफूज घर !
तमाम माओं की दुवाए अच्छी है !!

दिल की गिरह रखते है खोलकर,!
हर शख्स की अदाए अच्छी है !!

बड़े सुकून से गुजरता है वक़्त !
हमारी जुबा की सदाए अच्छी है !!

सांस लेते है सब एक माहोल में !
मेरे आँगन की फिजाये अच्छी है !!

खौफ नहीं मुझे खुदा की फजल से!
मेरे सफ़र की राहें अच्छी है!!!