कल अचानक याद आई
वो डायरी
जो रखी थी
मेज की दराज में
आज भी संजोयी रखी थी
उसमें
तुम्हारी जेठ में कुम्भ्लाई काया!
आज भी महकता है
आसाढ़ का वो चमकता दिन
हमारी पहली मुलाकात का
तुम्हारी चटकती मुस्कान का !
सहेजे रखे है,
बरसात के भींगे दिन
लिपटी पड़ी है
भादो की गरजती रातें !
रखे है अनमोल पल
जो कातिकी के मेले में
तुम्हारे साथ बिताये !
और
रखी है पूस की
ठिठुरती काली रात
बंद कमरे का वो
एकांकीपन
डायरी के कुछ पन्ने
फटे पड़े है
रखे है उसमें
पतझर के वो झरते सपने !
कुछ पन्ने अब भी अधूरे है
उन्हें इन्तजार है,
फागुन में
तुम्हारे स्पर्श के
हरे भरे एहसास का !!!!
Tuesday, November 8, 2011
Saturday, November 5, 2011
दामन
जिगर और दिल को बचाना भी है !
नजर आप से ही मिलाना भी है !!
मोहोब्बत का हर भेद पाना भी है !
मगर अपना दामन बचाना भी है !!
जो दिल तेरे गम का निशाना भी है !
कतील-जफा-ऐ-जमाना भी है !!
खिरद की एतात जरुरी सही !
यही तो जूनू का जमाना भी है!!
मुझे आज साहिल पर रोने भी दो!
की तूफान में मुस्कुराना भी है !!
ज़माने से आगे तो बढिए "सिद्धार्थ"!
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है !!
नजर आप से ही मिलाना भी है !!
मोहोब्बत का हर भेद पाना भी है !
मगर अपना दामन बचाना भी है !!
जो दिल तेरे गम का निशाना भी है !
कतील-जफा-ऐ-जमाना भी है !!
खिरद की एतात जरुरी सही !
यही तो जूनू का जमाना भी है!!
मुझे आज साहिल पर रोने भी दो!
की तूफान में मुस्कुराना भी है !!
ज़माने से आगे तो बढिए "सिद्धार्थ"!
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है !!
Wednesday, November 2, 2011
रिश्तो के परे जिन्दगी
एक दिन मैंने देखा
की ट्रेन में झाड़ू देने वाला बच्चा बेहद खुश था
फर्श बुहार रहा था
और तन्मयता से एक गीत भी गा रहा था
मुझे उसपर बहुत प्यार आया
जब पूरी सफाई कर
हाथ पसारे मेरे पास आया
मैंने एक सिक्का देते हुए नाम पूछा
उसने कहा 'नहीं मालूम'
मैंने उसके घर के बारे में पूछा
उसने कहा 'नहीं मालूम'
मैंने उसके पिता का नाम पूछा
उसने कहा 'नहीं मालूम'
मैं पा गया उसके खुश रहने का कारण
मुझे सब कुछ मालूम था
मुझे हो आया अपना दुःख स्मरण!
की ट्रेन में झाड़ू देने वाला बच्चा बेहद खुश था
फर्श बुहार रहा था
और तन्मयता से एक गीत भी गा रहा था
मुझे उसपर बहुत प्यार आया
जब पूरी सफाई कर
हाथ पसारे मेरे पास आया
मैंने एक सिक्का देते हुए नाम पूछा
उसने कहा 'नहीं मालूम'
मैंने उसके घर के बारे में पूछा
उसने कहा 'नहीं मालूम'
मैंने उसके पिता का नाम पूछा
उसने कहा 'नहीं मालूम'
मैं पा गया उसके खुश रहने का कारण
मुझे सब कुछ मालूम था
मुझे हो आया अपना दुःख स्मरण!
Monday, October 31, 2011
ये शहर कैसा है??
किसके काटे का बताये की असर कैसा है ?
कोई कैसा है जहर,कोई जहर कैसा है ??
अपनी अपनी है शाम,अपनी अपनी है सहर
कोई जाने ना किसी को, ये शहर कैसा है??
बस गए है कुछ नए अमीर अब इस बस्ती में
दीन -ईमान नहीं इनका,मगर पैसा है
शोर-गुल,भीड़- भाड़,और धुवा भी कितना
सांस लेता हुआ इनमें ,ये शजर कैसा है ??
तेज रफ़्तार बनी है ये जिन्दगी कितनी ?
हर तरफ जाम लगा है ये सफ़र कैसा है ??
हो गयी कार भी बेकार जाम में "सिद्धार्थ"
उतर कर भाग रहा है जो,बशर कैसा है ?
कोई कैसा है जहर,कोई जहर कैसा है ??
अपनी अपनी है शाम,अपनी अपनी है सहर
कोई जाने ना किसी को, ये शहर कैसा है??
बस गए है कुछ नए अमीर अब इस बस्ती में
दीन -ईमान नहीं इनका,मगर पैसा है
शोर-गुल,भीड़- भाड़,और धुवा भी कितना
सांस लेता हुआ इनमें ,ये शजर कैसा है ??
तेज रफ़्तार बनी है ये जिन्दगी कितनी ?
हर तरफ जाम लगा है ये सफ़र कैसा है ??
हो गयी कार भी बेकार जाम में "सिद्धार्थ"
उतर कर भाग रहा है जो,बशर कैसा है ?
Saturday, October 29, 2011
खवाब

ना कोई खवाब हमारे है ना ताबीरे है !
हम तो पानी पर बनायीं हुयी तस्वीरे है!!
लुट गए मुफ्त में दोनों ,तेरी दौलत मेरा दिल !
ए दोस्त !तेरी मेरी एक सी तकदीरे है !!
कोई अफवाह गला कट ना डाले अपना !
ये जुबाने है की चलती हुयी शमशीरे है !!
हम तो नक्वादा (अनपढ़)नहीं है तो चलो आओ पढ़े !
वो जो दिवार पर लिखी हुयी तहरीरे है !!
हो ना हो ये कोई सच बोलने वाला है "सिद्धार्थ"!
जिसके हाथों में कलम पाँव में जंजीरे है !!
Tuesday, October 25, 2011
कैसे कहूं दीवाली है
आज की रात ये रौशन है
कल फिर सुबह काली है
झूठी होती इस दुनिया में
... सच का दिया जो खाली है
कैसे कहूं दीवाली है !
टूटी अब हर रिश्तों की डाली है
रिश्ता भी अब एक गाली है
प्यार की बगिया जो खाली है
रोया हर एक माली है
कैसे कहूं दीवाली है !
तिनका तिनका बिखरा भारत अब
घुट घुट कर रोती भारत माता अब
देशप्रेम का उपवन अब ये खाली है
जिसकी भारत माँ ही माली है
कैसे कहूं दीवाली है !
भ्रष्टाचार की गहरी रात ये काली है
नेता करते देश की बिकवाली है
फैला हर ओर धोखा है दलाली है
बेचारी जनता, नेता अत्याचारी है
कैसे कहूं दीवाली है !
देश भक्ति का दिया जो खाली है
देश प्रेम की गर्म रक्त से
सुलग रहे हर देश भक्त से
नयी क्रांति आने वाली है
कैसे कहूं दीवाली है !
जलो तुम स्वरक्त से दिया भर
भारत माँ तुम्हे जगाने वाली हैं
भारत की जगमग ज्योति से
दुनिया हुयी उजाली है
दूर नहीं अब नव भारत की
कुछ ही दूर दीवाली है
पर कैसे कहूं दीवाली है !
दीपावली
नेह-प्रेम,विस्वास- आस के नव उजियार भरे!
अलग -अलग भावो के मैंने अनगिनत दीप धरे!
दीप एक विस्वास का बाला तुलसी के आगे!
जोड़ रहा है दीया द्वार का मन के टूटते धागे!
जले आस्थाओ के दीपक घर,आँगन,कमरे!
रख आया में दीप प्रेम का विश्वासों के तट पर !
और नेह का दीप जलाया हर सुनी चौखट पर !
गीत कई गूंजे सुधियों में फिर भूले बिसरे !
सपनो के रंगों-सी झिलमिल ये बल्बों की लड़िया !
नहा रही है आज रौशनी से घर आँगन गलियां !
फुलझरियों -सी हँसती खुशियाँ झर-झर ज्योति झरे !
आप सभी मित्रो को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये!!!!!
अलग -अलग भावो के मैंने अनगिनत दीप धरे!
दीप एक विस्वास का बाला तुलसी के आगे!
जोड़ रहा है दीया द्वार का मन के टूटते धागे!
जले आस्थाओ के दीपक घर,आँगन,कमरे!
रख आया में दीप प्रेम का विश्वासों के तट पर !
और नेह का दीप जलाया हर सुनी चौखट पर !
गीत कई गूंजे सुधियों में फिर भूले बिसरे !
सपनो के रंगों-सी झिलमिल ये बल्बों की लड़िया !
नहा रही है आज रौशनी से घर आँगन गलियां !
फुलझरियों -सी हँसती खुशियाँ झर-झर ज्योति झरे !
आप सभी मित्रो को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये!!!!!
Subscribe to:
Posts (Atom)