Monday, February 6, 2012

मौसम की ख़ामोशी

समंदर से उठे है या नहीं बादल ये रब जाने !
नजूमी बाढ़ का मंजर लगे खेतों को दिखलाने !!

नमक से अब भी सूखी रोटियां मजदूर खाते है !
भले "सिद्धार्थ"ने लिखे हो इनके अफ़साने !!

रईसी देखनी है मुल्क की तो क्यूँ भटकते हो!
सियासत्दा का घर देखो या फिर मंदिर के तहखाने  !!

मुसाफिर छोड़ दो  चलना ये रास्ते है तबाही के !
यहाँ हर मोड़ पर मिलते है साकी और मयखाने !!

चलो जंगल से पूछे या फिर पढ़े मौसम की ख़ामोशी !
परिंदे उड़ तो सकते है मगर गाते नहीं गाने !!

ये वो बस्ती है जिसमें सूर्य की किरण नहीं पहुंची !
करोगे जानकर भी क्या ये सूरज-चाँद के माने !!

सफ़र में साथ चलकर हो गए हम और भी तन्हा !
ना उनको हम कभी जाने ना वो हमको ही पहचाने!!

Friday, February 3, 2012

परित्यक्ता (लघुकथा )



बूढी  औरत ने दोनों हाथ फैला दिए,
"बेटा कुछ दे दो!"
एक यात्री ने पूछा ,"बुढिया तेरे कितने बेटे है?"
बूढी औरत नें अपनी छाती फुला कर कहा
 "मेरे चार बेटे है!"
"तब तो तू आठ हाथोवाली बेटो की माँ है",यात्री ने
हिसाब लगाते हुए कहा!
बूढी औरत के फैले हुए हाथ जरा नीचे झुक गए !
उसने कहा ,"हां रे,एकदम!"
यात्री ने जानना चाहा ,"वे सभी मिलकर खूब कमाते भी होंगे!"
एस बार बूढी औरत की नजर भी झुक गयी !
फिर आवाज में तल्खी भरते हुए बोली,"हां,हां,वे खूब पैसा बनाते है!"
"वे तुझे साथ भी रखते होंगे और शायद
तुझे पलकों पर बैठा कर रखते भी"......यात्री बोलते बोलते चुप हो गया था !!!!

कबाड़ बीननेवाली

देखा मैंने एक कबाड़ बीननेवाली को
दिसम्बर की शीत-दोपहरी में
एक रिक्शे पर एक मासूम बच्चे के साथ
अधलेटी पट्टी पर पर रिक्शे की
और कबाड़ की बड़ी गठरी सीट पर
भावहीन दो आँखें घूरती दाये-बाये 
किया अनुभव मैंने जिन्दगी ऐसी भी होती है
हर सुबह संगर्ष 
हर रात एक अनबुझ पहेली होती है
जीना सिखाती है ऐसी माँ बच्चे को बिना सहारे
यहाँ जरुरी होता है दो वक़्त का खाना
सपनो की यहाँ जरुरत नहीं
सपने तो आते ही नहीं
नींद आती है थकान के लिए!!!! 

Monday, January 30, 2012

भोर नहा कर चली गयी !!!

धुप देर से आई
जल्दी चल गयी!
किसे पता,जादूगरनी
किस गली चल गयी!

हवा बड़ी मुहजोर
किसी की एक नहीं सुनती है
बागो की हरियाली
बैठे स्वेटर बुनती है

पारदर्शी परदे
पानीदार पड़े
जरा झलक दिखलाई
भीतर चली गयी!

फौजी कम्बल ओढ़े
सिक्रुड़े बैठे टीले है
केश सुबह के देखो
अब तक पूरे गिले है !

दूर -दूर तक पगडण्डी पर
बुँदे बिखरी है
किसी नदी में भोर
नहा कर चली गयी!

सनाटा है ,शोर
बर्फ सा कैसा जमा हुआ
रोम रोम में सबके जैसे
जाड़ा रमा हुआ

सबको घर जाने की
कितनी जल्दी है
खुश्बू आई,
आँख बचा कर चली गयी !!!


Wednesday, January 18, 2012

क्योंकि तुम मुझे मुझसे ज़्यादा जानती हो।

मुझे आज तक
कभी तुमसे कुछ कहना नहीं पड़ा
तुम हमेशा
मुझे देखकर समझ जाती हो
…कि आज ‘मूड’ अच्छा है,
... …कि आज कुछ उखड़ा-उखड़ा है।
…कि आज हम घंटों बतियाएंगे
…कि आज बिना हाथ हिलाए ही
चले जाएंगे
अपने-अपने घर!

तुम्हें
अक़्सर पता होता है
कि कब मुझे तुम्हारा हाथ चाहिए
ताली मारने के लिये,
…ठहाका लगाने से पहले।
और कब तुम्हारा कंधा,
देर तक सुबकने के लिए!

तुमने कई बार मेरे शक़ को यक़ीन मे बदला है
कि सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम ही
मुझे मुझसे ज़्यादा जानती हो।
और इसीलिए
मैं आज तक
तुमसे कभी नहीं कह पाया
कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।

क्योंकि हमेशा मुझे लगा
कि शायद मैं तुमसे प्यार करता ही नहीं
अगर करता
तो तुम बहुत पहले ही मुझे बता चुकी होतीं
…क्योंकि तुम
मुझे मुझसे ज़्यादा जानती हो।

Sunday, January 8, 2012

इरादा

एक गजल उसपर लिखू दिल का तकाजा है बहुत
इन दिनों खुद से बिछड़ जाने का इरादा है बहुत

रात हो ,दिन हो,गफलत हो , की बेदारी हो
उसको देखा तो नहीं है,उसे सोचा है बहुत

तिस्नगी के भी मकामत है क्या क्या यानी
कभी दरिया नहीं काफी ,कभी कतरा है बहुत

मेरे हाथो की लकीरों के इजाफे है गवाह
मेरे पत्थर की तरह खुद को तराशा है बहुत

कोई आया है जरुर और ठहरा भी है
घर की देहलीज़ पर ऐ"सिद्धार्थ" उजाला है बहुत

Sunday, December 11, 2011

पत्थर बोलते नहीं चुप रहते है !!!!!

वे गूंगे है वे बोल नहीं सकते है
जो बोल सकते है वे चुप है



वे अंधे है वे देख नहीं सकते है
जो देख सकते है उनकी आँखें बंद है



वे बहरे है वे सुन नहीं सकते है
जो सुन सकते है
लेकिन सुनना नहीं चाहते है



वे सब खामोश है
क्यूंकि वे ख़ामोशी चाहते है



वे हाड-मांस के पुतले है
फिर भी खामोश है


वे नहीं चाहते है ,सुनना ,बोलना,देखना
अब वे पत्थर हो चुके है

पत्थर बोलते नहीं चुप रहते है !!!!!