Thursday, July 12, 2012

छाता और महकता हुआ गुलाब


बहुत  दिनों से इच्छा थी 
की  तुम्हारे लिए     
खरीद  दू 
एक कामचलाऊ  मगर  
सस्ता सा छाता           
चिल्चाती धुप के बीच 
तुम्हे आना जाना पड़ता है 
जिसकी वजह से 
पसीने से भींग कर 
कुम्हला जाता है  
तुम्हारा गुलाबी चेहरा 














































आज दोपहर में जब 
तुम स्टैंड पर खड़ी थी 
कर रही थी इन्तजार 
बस का 
और सूरज नोच रहा था 
तुम्हारा बदन 
तब मैं यही सब सोच रहा था 
की अचानक एक काली बदली 
भटकती हुयी सी आई जाने कहा से 
और छाता बनकर तन गयी 
तुम्हारे उपर 
मैं बहुत खुश था 
की मेरी इच्छा पूरी हो गयी 
तुम भी तो खुश थी बहुत 
जैसे महक उठा हो 
गुलाब कोई !!!!!

2 comments:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

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  2. बहुत ही प्यारी रचना..

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