Thursday, July 28, 2011

हिसाब

अब अपनी रूह के छालो का कुछ "हिसाब" करू !

मैं चाहता था चरागों को आफताब करू !!

बुतों से मुझको इजाजत अगर कभी मिल जाये !

तो शहर भर के खुदाओ को बेनकाब करू !!


मैं करवटों के नए जाएके लिखू शब् भर !

ये इश्क है तो कहा जिन्दगी अजाब करू !!


है मेरे चारो तरफ भीड़ गुंगो बहरो की !

किसे खातिब बनाऊँ किसे ख़िताब करू !!



उस आदमी को बस एक धुन सवार रहती है !

बहुत हासिल है ये दुनिया इससे ख़राब करू !!

ये जिन्दगी जो मुझे कर्ज़दार करती रही !

कही अकेले में मिल जाये तो हिसाब करू!!!!!

5 comments:

  1. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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