Thursday, July 7, 2011

कमी ढूंढते रहे !!

हम उनके नाचने में कमी ढूंढते रहे !
वे मेरे अंगने में कमी ढूंढते रहे !!

चेहरे पर अपने एतबार इतना था हमे !
हम अपने आईने में कमी ढूंढते रहे !!

अपनी कमाई जिनके बीच बांटता रहा !
वो मेरे बाँटने में कमी ढूंढते रहे !!

जिनके पालने में झूल-झूल कर बड़े हुए !
फिर अपने पालने में कमी ढूंढते रहे !!

बेटी का हाथ थाम लिया बिन दहेज़ के !
सब लोग पाहुन(बेटी का पति)में कमी ढूंढते रहे !!

वो प्यार के सिखा गए हम को मायने !
हम उनके मायने में कमी ढूंढते रहे !!

5 comments:

  1. व्यवहारिक बात कहती बेहतरीन रचना.

    सादर

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  2. kamiyan hi dhoondte rahenge to jindgi khud ko nakara lagne lagegi..soch badal leni chaahiye.

    sunder abhivyakti.

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  3. लोंग दूसरों की कमियां ही निकालने में लगे रहते हैं ..सटीक बात कही है

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  4. कल 10/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. इसी कमी निकालने की आदतें कम होनी चाहिये।

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