Monday, July 25, 2011

गोहरबार(मोती का पानी)

जहा कतरे को तरसाया गया हू !

वोही डूबा हुआ पाया गया हू !!

बला(मुसीबत) काफी ना थी एक जिन्दगी की !

दुबारा याद फ़रमाया गया हू !!

सुपुर्द--ख़ाक(दफनाना) ही करना है मुझको !

तो फिर काहे को नहलाया गया हू !!

गोहरबार(मोती का पानी) हू मैं !

मगर आँखों से बरसाया गया हू !!

"सिद्धार्थ"अहले जब कब मानते है !

बड़े जोरो से मनवाया गया हू !!

7 comments:

  1. बहुत खूबसूरती से लिखा है

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  2. क्या कहूँ इस पर ऐसा लगा दिल निकाल कर रख दिया हो।

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  3. आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  4. बहुत खूब दोस्त जी :)

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  5. Aap sabhi ka dhanyawaad.......

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