Saturday, May 29, 2010

सदमा


किसी से कभी दिल लगाया ना था
मोहोब्बत का सदमा यूँ तो आया ना था
हसीनो के रोने पर ना हँसते थे हम
कभी एक आंसू बहाया ना था
कोई भी हूर हो या परी अपना सर
किसी जगह पर झुकाया ना था
सायाह(काली)गेसुओ की तम्मना रही
मगर दिल को हमने फसाया ना था
ज़माने में वो कौन था जोहरा-बस(बेदर्दी)
के सिने से जिसने लगाया ना था
बसर की सदा ऐश-ओ-इशरत में उम्र
कभी रंज हमने यूँ तहराया ना था
मगर एक झलक ने हमें खो दिया
ये सदमा तो हमने टेहराया ना था

4 comments:

  1. अपने जज्बातों को आकर्षक अभिव्यकति देती सुन्दर रचना।

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  2. दिल के सुंदर एहसास
    हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

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  3. aap sabhi ka dhanyawaad jo aapko acchi lagi.....

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