Tuesday, September 28, 2010

हर राज़ खोलती हैं

खामोश है जुबां पर आँखें तो बोलती हैं
क्या क्या छुपा है दिल में हर राज़ खोलती हैं

आँखों में बसे अश्क भी आज़ाद हो गए
हम तो संभल संभल कर बर्बाद हो गए
आहों से भरी साँसे भी कुछ बात बोलती हैं
क्या क्या छुपा है दिल में हर राज़ खोलती हैं

हमने कभी जो चाहा किस्मत से वो णा पाया
महफ़िल के दौर में भी तनहा ही खुद को पाया
तन्हाईयाँ भी सांसों में कुछ दर्द घोलती हैं
क्या क्या छुपा है दिल में हर राज़ खोलती हैं

तुम तो थे मेरे अपने तुम ही न जान पाए
हाल - ए- दिल को मेरे पहचान ही न पाए
बिन मांझी के जिंदगी कि नैया ये डोलती है
क्या क्या छुपा है दिल में हर राज़ खोलती हैं..
हर राज़ खोलती हैं......

8 comments:

  1. naa samjhe jane kee vytha bade hee sunder tareeke se aapne vykt kee hai.
    sunder abhivykti.......
    Aabhar

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    काव्य प्रयोजन (भाग-१०), मार्क्सवादी चिंतन, मनोज कुमार की प्रस्तुति, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

    ReplyDelete
  3. क्या बात है, बहुत बेहतरीन!

    ReplyDelete
  4. जिन्हें हम अपना समझते हैं अक्सर वो ही हानि जानते हमारा हाल ..... बहुत खूब लिखा है ...

    ReplyDelete