Sunday, April 18, 2010

रात की तीरगी.....

रात की तीरगी मिटाने के लिए
जल गया घर दिया जलाने के लिए
तेज बारिश से बच सकू कैसे
चार तिनको के आशियाने के लिए
शर्म आती है उनको जाने क्यूँ?
नाम लेकर मुझे बुलाने में
कुछ हवा की भी शरारत है
रुख से तेरा नकाब हटाने में
हाथ क्या आये जख्मे गम के सिवा
एक पत्थर से दिल लगाने में
दिल की दुनिया बदल गयी है "दोस्तों"
उनके एक बार मुस्कुराने में........

4 comments:

  1. bahut khub



    shekhar kumawat


    http://kavyawani.blogspot.com

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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  4. Thanks Shekhar and sanjay ji jo aapko pasand aayi meri rachna.......

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