Wednesday, April 21, 2010

कह दे गरूर मेरा है

मेरे से वजूद मेरा है कह दे गरूर मेरा है
काश!कहने की आदत ही छोड़ दी मैंने
जो हो रहा है सब नसीब मेरा है
मैंने छोड़ी थी कभी राह उस पर नहीं गया
भले ही उसपर खड़ी आज नई बस्ती थी
बुतपरस्ती मेरी फितरत थी न उसे छोड़ सका
कोई खाफिर कहे इसको भी मैं न झेल सका
अब कुछ बचा नहीं खुद पर सितम
ढाने को फिर हुयी रात और तेरे याद में दिल डूब गया.........

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